घेरता मुझको अँधेरा हँसता है उन्माद में
छिप रहा हूँ तो मैं क्या, जा रहा हूँ मांद में
कहते हैं सब देख मुझे, अस्त हो रहा हूँ मैं
होंसले बाकी हैं अब भी, ना समझ पस्त हो रहा हूँ मैं
माना थक कर चूर हूँ समय है सो जाने का
लौटूंगा जब होगा पल जग में अलख जगाने का
देखूंगा कल कौन सूरमा आगे मेरे आयेगा
कौन मेरे धधकते तेज़ को सह पायेगा
किसकी ताकत तब मेरा उदय रोक पायेगी
मन की कुंठा दुश्मनों की, मन में ही रह जाएगी
सर्वत्र रोशन करूँगा, तमस हार जायेगा
और जग सूरजमुखी के फूल सा मुस्काएगा
fantastic poem... keep it up
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